विधानसभा चुनाव के नतीजे मिथक तोड़ेंगे या एक बार BJP अगली बार Congress की सरकार वाला ट्रेंड कायम रहेगा? मतदान फिर साल-2017 के बराबर हुआ या फिर उससे भी कुछ प्रतिशत अधिक होना तय है। इसका मतलब क्या निकाला जाए? पुष्कर सिंह धामी की छह महीने की तगड़ी दौड़ धूप रंग ला रही है या फिर आम आदमी पार्टी और बसपा नए मतदाताओं को घरों से मतदान केंद्र तक निकालने में सफल रहे, इसलिए मतदान बढ़ा। काँग्रेस आशा लिए बैठी है कि 10 मार्च को उसका झण्डा जरूर फहरेगा। BJP शर्तिया भगवा फहरने की पूरी उम्मीद लिए बैठी है। चुनाव का आलम इसके विपरीत इस बार ऐसा है कि जिनको सियासत और चुनाव की ख़ासी समझ भी है, वे भविष्यवाणी की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। उनका मानना है, `इस बार कुछ भी हो सकता है। किसी भी पार्टी पर सरकार बनाने का जुआ खेलना खतरे से खाली नहीं’।
ये तय है कि जब मतदान के अंतिम आंकड़े आएंगे तो ये 5 साल पहले के विधानसभा चुनाव से निश्चित रूप से अधिक ही रहेगा। अगर मतदान अधिक होता है तो इसको किस तरह से देखा जाए, इसका निष्कर्ष निकालना बहुत दुष्कर साबित हो रहा। पिछली बार इतने ही वोट पड़े तो बीजेपी ने उत्तराखंड से काँग्रेस का सफाया कर दिया था। 70 में से 57 सीटें उसकी झोली में आई थी। तो क्या इस बार तब से अधिक मतदान होना फिर बीजेपी के हक में जाएगा? या इस बार ये मतदान उसके खिलाफ महंगाई-बेरोजगारी को ले के व्याप्त नाराजगी का फल है? कम या अधिक मतदान को ले के दो किस्म की राय सामने आती है।