कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि हरकी पैड़ी पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु रहते हों और वहां कुंभ की भारी भीड़ के समय भी कोई घोड़े दौड़ा सकता है, लेकिन 1998 के कुंभ में ऐसा हुआ। संन्यासी अखाड़ों के बीच परस्पर खूनी संघर्ष हुआ।

दोनों ओर के करीब पचास नागा घायल हुए और अनेक महामंडलेश्वरों व एक शंकराचार्य को अपमान झेलना पड़ा। दरअसल कुंभ के शाही स्नानों में अखाड़ों के बीच स्नान का एक क्रम निर्धारित है। प्रत्येक अखाड़े के हजारों साधुओं को प्रशासन के तय स्नान समय का कड़ाई से पालन करना पड़ता है।