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बीजेपी और कांग्रेस में कांटे की टक्कर, इस बार आसान नहीं चुनाव जादू हुआ कम….

इस बार उत्तराखंड विधानसभा चुनाव बहुत दिलचस्प रहने के साथ ही साल 2012 की मानिंद बेहद कांटे का रह जाए तो ताज्जुब नहीं होगा। दोनों तरफ Deadly Combination होने के चलते ऐसा देखा जा रहा। BJP के पास CM पुष्कर सिंह धामी के साथ जादूगर का दर्जा रखने वाले पीएम नरेंद्र मोदी हैं। काँग्रेस के पास इस बार युवा और ऊर्जावान पीसीसी अध्यक्ष युवा गणेश गोदियाल हैं। उनके साथ बेहद अनुभवी हरीश रावत हैं। दोनों बीजेपी का पसीना छुड़ाने में सक्षम हैं। ये चुनाव कुछ इस तरह के हैं कि काँग्रेस और बीजेपी के कई दिग्गजों के राजनीतिक जीवन को चमका सकते हैं या फिर सदा के लिए उनका सूरज डुबो भी सकते हैं।

पुष्कर ने 6 महीने के कार्यकाल में लस्त-पस्त-हताश हो चुकी BJP को न सिर्फ जिंदा और खड़ा किया बल्कि ये उनकी ही मेहनत का फल है कि पार्टी फिर सत्ता में वापसी की उम्मीद बांधे बैठी है। बेशक आचार संहिता से ऐन पहले अंतिम मौकों पर कुछ तबादलों, राजनीतिक नियुक्तियों से बचा जा सकता था। खनन के मामलों में कुछ आरोप लगे, लेकिन सरकार और सियासत में ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं होती है। सच तो ये है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत के मंत्रिपरिषद तक में जगह न पा सके पुष्कर ने परिपक्व आचरण-बयानों और कार्य शैली से दोनों पूर्व CMs से अधिक अंक और ख्याति अर्जित करने में सफलता पाई है।

पार्टी और सियासी विश्लेषकों में ऐसे लोग भी हैं जो ये मानने से गुरेज नहीं करते हैं कि पुष्कर को कम से कम एक साल पहले सरकार सौंपी गई होती तो बीजेपी आज बहुत मजबूत स्थिति में होती। युवा सीएम ने अकेले दम ही काँग्रेस के दिग्गजों की फौज, जिसमें हरीश रावत, गणेश गोदियाल, प्रीतम सिंह और अन्य शरीक हैं, के दस्ते को जबर्दस्त टक्कर दी है। ऐसा तब है जब संगठनात्मक तौर पर बीजेपी इस बार बहुत कमजोर नजर आ रही।

काँग्रेस संगठन उसके मुक़ाबले कहीं अधिक सक्रिय और आक्रामक नजर आया है। ऐसा पहली बार दिख रहा है। पहले बीजेपी के मुक़ाबले काँग्रेस संगठन बहुत खस्ताहाल दिखा करता था। इस बार काँग्रेस बहुत जोश और आक्रामक मूड में नजर आ रही है। कई मौके ऐसे आए, जब पुष्कर अकेले ही जूझते दिखे। आपदा के वक्त वह एकदम भोर से ले के देर रात तक मौकों पर पहुँचते रहे। पीड़ितों को राहत देने की कोशिश की। तब संगठन के लोग मैदान में कम ही दिखे। काँग्रेस के जुबानी हमलों के जवाब भी आम तौर पर वही मजबूती से दे रहे।

पुष्कर को पार्टी से अधिक समर्थन न मिलता दिखने की एक वजह एक लॉबी को इतने युवा मुख्यमंत्री की सफलता अपने भविष्य के लिए खतरा नजर आना है। इस लॉबी से जुड़े लोग अंदरखाने सीएम के खिलाफ लगातार खुरपेच भी करते रहे हैं। पुष्कर के पास सत्ता में रहते पार्टी को चुनाव जितवा के उत्तराखंड में नया सियासी इतिहास लिखने की चुनौती है। उनके पास खुद के अलावा इस अहम चुनौती को पार लगाने के लिए सिवाय पीएम मोदी के कोई और सहारा नहीं है।

मोदी का नाम साल 2017 में चमत्कार साबित हुआ था। इस बार उनसे चमत्कार की उम्मीद तो नहीं की जा रही लेकिन वह ऐसी सीटों पर जनसभाओं के जरिये निर्णायक साबित हो सकते हैं, जहां हार-जीत का अंतर बेहद कम रहने की गुंजाइश देखी जा रही। मोदी का व्यक्तित्व और पुष्कर की काबिलियत का संगम ही बीजेपी के लिए फतह की उम्मीद है। पुष्कर ने खटीमा में हालात को अपने हक में बहुत मजबूत कर लिया है। फिर भी वह कितना वक्त अन्य सीटों पर प्रचार के लिए निकाल सकेंगे, इस पर भी नजर है।

दो दशक पहले सियासत में कदम रखने वाले गणेश ने काँग्रेस की लगाम संभालने के बाद इसमें उसी तरह प्राण फूँक डाले हैं, जैसा पुष्कर ने अपनी पार्टी के लिए किया। जो काँग्रेस मरणासन्न और आपसी विवादों में एक-दूसरे सरदारों को लहू लुहान करती दिखती थी, वह अचानक ही उठ के लड़ती दिखने लगी। लगातार अपनी सक्रियता से सोशल मीडिया और खास तौर पर काँग्रेस की अंदरूनी सियासत को गरम रखने वाले हरीश का साथ मिलने के बाद गणेश आज सिर्फ बीजेपी के ख्वाबों के लिए ही नहीं बल्कि काँग्रेस के ही कई सूबेदारों के लिए भी खतरा बन चुके हैं