देश:वर्ष 1991-92 में देश में वार्षिक दुग्ध उत्पादन 5.56 करोड़ टन और प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता केवल 178 ग्राम प्रति दिन हुआ करती थी। बढ़ती आबादी के बावजूद देश के किसानों ने दुग्ध उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 2018-19 में 18.77 करोड़ टन तक पहुंचा दिया और प्रति व्यक्ति प्रति दिन दुग्ध उपलब्धता बढ़कर 394 ग्राम तक पहुंच गई।

लेकिन कोरोना संकट में मांग में कमी आने के कारण किसानों को अपना दूध उत्पादन लागत से लगभग आधे दामों पर बेचना पड़ रहा है। किसान इसके खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं, और सब्सिडी की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार की तरफ से अभी किसी राहत की घोषणा नहीं की गई है।
कोरोना संकट के पूर्व किसानों को दूध की अच्छी कीमत मिल रही थी। डेरी कंपनियां गाय के दूध (3.5 फीसदी फैट) के लिए लगभग 25 रुपये प्रति लीटर और भैंस के दूध (6.5 फीसदी वसा और 9 फीसदी SNF या सोलिड्स नॉट फैट्स) के लिए 35-40 रुपये प्रति लीटर तक की कीमत दे रही थीं। लेकिन कोरोना संकट के कारण होटल, रेस्टोरेंट, आइसक्रीम बिजनेस, त्यौहार और शादियों में दूध की मांग न के बराबर रह गई।
इस कारण अब डेरी कंपनियां किसानों को गाय के दूध के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में 16-20 रुपये और भैंस के दूध के लिए 25-30 रुपये तक ही दे रही हैं। किसानों को प्रति लीटर दूध की कीमत में आठ से दस रुपये तक की कमी आई है। (अलग-अलग डेरी कंपनियां अलग-अलग राज्यों में किसानों को अलग-अलग मूल्य देती हैं। इनमें भी दस रुपये तक का अंतर होता है।)
इसी समय आम उभोक्ताओं को दूध की अलग-अलग श्रेणियों के लिए 45 से 55 रुपये प्रति लीटर तक की कीमत चुकानी पड़ रही है। दूध के पाउडर के दाम भी ऊंचे बने हुए हैं, कई ब्रांड्स की कीमत 350-400 रुपये प्रति किलो तक हैं, लेकिन किसानों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है।
किसानों की लागत
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि किसानों को दूध उत्पादन में गाय और भैंस के अनुसार 30-35 रुपये प्रति लीटर तक की लागत आती है। किसानों के दूध की कीमत अगर 35 और 45 रुपये प्रति लीटर मिलती है, तभी उनके लिए यह लाभ का सौदा साबित होगा। अगर उन्हें इससे कम कीमत मिलती है तो वे खेती की तरह पशु-पालन त्यागने पर भी विचार करेंगे जो देश के लिए दुखद खबर होगी।
कर्नाटक का उपाय, महाराष्ट्र की मांग
स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी की मांग है कि महाराष्ट्र सरकार किसानों को दस रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी या डायरेक्ट कैश बेनिफिट प्रदान करे। केवल इसी के जरिए किसानों को बचाया जा सकेगा। वे दुग्ध पाउडर पर 50 रुपये प्रति किलो तक की सहायता की भी मांग कर रहे हैं।
कर्नाटक सरकार अपने किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए प्रति लीटर 6 रुपये की आर्थिक मदद दे रही है। किसान जितने लीटर दूध डेरी को बेचता है, उसी के हिसाब से उसके बैंक खाते में आर्थिक राशि पहुंचा दी जाती है। महाराष्ट्र के किसान इसी नीति पर चलते हुए 10 रुपये प्रति लीटर की आर्थिक सहायता की मांग कर रहे हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की मांग पर 10 लाख लीटर दूध रोज खरीदने की बात कही थी। इसके लिए 200 करोड़ रुपये का फंड भी निर्धारित किया गया था। लेकिन वह भी लगभग 5-6 लाख लीटर से अधिक की खरीद नहीं कर पा रही है। इससे किसान अपना दूध सड़क पर बहाने को मजबूर हो गए हैं।
कहां हो दूध की खपत
किसान हो या सरकार सबके सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि कोरोना काल में दूध की खपत कहां की जाय? आइसक्रीम बिजनेस में दूध की भारी मांग होती थी, लेकिन कोरोना संकट के कारण यह व्यवसाय सिमट कर एक तिहाई पर रह गया है। लिहाजा यहां दूध की मांग में भारी गिरावट आई है। इसके आलावा भीड़भाड़ वाली शादियां न होने, त्योहारों के फीके रहने, होटल-रेस्टोरेंट बंद रहने से दूध की खपत बहुत ज्यादा गिर गई है।
दूध को ज्यादा समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, लेकिन दूध पाउडर को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यही कारण है कि दूध को खपाने के लिए उसका पाउडर (Skimmed Milk Powder, SMP) बनाना सबसे अच्छा कदम माना जाता है। लेकिन इस समय की हालत यह है कि देश के पास लगभग 1.5 लाख टन दूध पाउडर पहले ही उपलब्ध है।
कोरोना संकट के पहले दूध पाउडर का दाम 250 से 350 रुपये प्रति किलो तक था, लेकिन मांग में कमी के कारण इसकी कीमतों में भी भारी गिरावट आई है। जनवरी माह में दूध की कमी हो गई थी। इसे देखते हुए सरकार ने 10 हजार टन दूध पाउडर के आयात का निर्णय भी ले लिया था।
अगर सरकार यह निर्णय वापस नहीं लेती है तो आने वाले समय में भी दूध की मांग पर असर पड़ सकता है। किसान सरकार से इस आदेश को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
सरकार को होती है जबर्दस्त कमाई
सीधे तौर पर सरकार किसानों से दूध उत्पादन के लिए कोई टैक्स नहीं लेती है, लेकिन इससे जुड़ी अन्य चीजों जैसे आइसक्रीम और दुग्ध पाउडर इत्यादि पर टैक्स से कमाई भी करती है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 30 लाख करोड़ रुपये के आसपास होता है। इसमें अकेले पशु-पालन से 10 लाख करोड़ रुपये तक का योगदान मिलता है। देश के कुल 14 करोड़ किसान परिवारों में से अनुमानत: 10 करोड़ छोटे सीमांत किसान पशुपालन से भी जुड़े हुए हैं। यह उनकी आय का अतिरिक्त जरिया होता है।
क्या हो सकता है संभावित उपाय
किसान नेता पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं हमें एक तरफ किसानों की सहायता करनी है दूसरी तरफ देश के करोड़ों भूखे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कुपोषण-खून की कमी से भी बचाना है। अगर सरकार किसानों से उचित कीमत पर दूध खरीद कर उन्हें मिड डे मील के जरिए बच्चों तक पहुंचाने की योजना पर काम करे तो दोनों ही समस्याओं का समाधान निकल सकता है।
इसके आलावा सरकार को 50 हजार टन दूध पाउडर का बफर स्टॉक रखना चाहिए, इससे बाजार में दूध की मांग बढ़ जाएगी।