कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार रात 8 बजे राष्ट्र को संबोधित करते हुए पूरे देश में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की.
इसमें ज़रूरी सेवाओं के अलावा सभी सेवाएं बंद कर दी गई हैं. कारोबार थम गया है, दुकानें बंद हैं, आवाजाही पर रोक है.
पहले से मुश्किलें झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना वायरस का हमला एक बड़ी मुसीबत लेकर आया है.
पिछले साल की ही बात करें तो ऑटोमोबाइल सेक्टर, रियल स्टेट, लघु उद्योग समेत असंगठित क्षेत्र में सुस्ती छाई हुई थी. बैंक एनपीए की समस्या से अब तक निपट रहे हैं.
सरकार निवेश के ज़रिए, नियमों में राहत और आर्थिक मदद देकर अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने की कोशिश कर रही थी
वरिष्ठ बिज़नेस पत्रकार पूजा मेहरा कहती हैं, “लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ेगा और हमारी अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत जीडीपी अनौपचारिक क्षेत्र से ही आता है. ये क्षेत्र लॉकडाउन के दौरान काम नहीं कर सकता है. वो कच्चा माल नहीं ख़रीद सकते, बनाया हुआ माल बाज़ार में नहीं बेच सकते तो उनकी कमाई बंद ही हो जाएगी.”
“हमारे देश में छोटे-छोटे कारखाने और लघु उद्योगों की बहुत बड़ी संख्या है. उन्हें नगदी की समस्या हो जाएगी क्योंकि उनकी कमाई नहीं होगी. ये लोग बैंक के पास भी नहीं जा पाते हैं इसिलए ऊंचे ब्याज़ पर क़र्ज़ ले लेते हैं और फिर क़र्ज़जाल में फंस जाते हैं. ”
अनौपचारिक क्षेत्रों में फेरी वाले, विक्रेता, कलाकार, लघु उद्योग और सीमापार व्यापार शामिल हैं. इस वर्ग से सरकार के पास टैक्स नहीं आता.
लॉकडाउन के इतर कोरोना वायरस के प्रभाव से भी कंपनियों को नुक़सान पहुंच सकता है.
पूजा मेहरा के मुताबिक़ जो लोग बीमार हैं वो काम नहीं कर सकते. कितने ही लोग सेल्फ़ आइसोलेशन में हैं. जिनका अपना कारोबार या दुकान है वो बीमारी के कारण उसे चला नहीं पाएंगे. जो ख़र्चा बीमारी के ऊपर होगा वो बचत से ही निकाला जाएगा. अगर ये वायरस नियंत्रण में नहीं आया तो ये असर और कहीं ज़्यादा हो सकता है.
वहीं, अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं, “लॉकडाउन से लोग घर पर बैठेंगे, इससे कंपनियों में काम नहीं होगा और काम न होने से व्यापार कैसे होगा और अर्थव्यवस्था आगे कैसे बढ़ेगी. लोग जब घर पर बैठते हैं, टैक्सी बिज़नेस, होटल सेक्टर, रेस्टोरेंट्स, फ़िल्म, मल्टीप्लेक्स सभी प्रभावित होते हैं. जिस सर्विस के लिए लोगों को बाहर जाने की ज़रूरत पड़ती है उस पर बहुत गहरा असर पड…
क्या ये दौर 2008 की मंदी जैसा है? पूजा मेहरा इससे साफ़ इनकार करते हुए कहती हैं, ये उससे भी ख़राब दौर हो सकता है. उस समय एयर कंडिशन जैसी चीज़ों पर टैक्स कम हुए थे. तब सामान की कीमत कम होने पर लोग उसे ख़रीद रहे थे लेकिन लॉकडाउन में अगर सरकार टैक्स ज़ीरो भी कर दे तो भी कोई ख़रीदने वाला नहीं
जानकार इन स्थितियों को सरकार के लिए भी बहुत चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं. अचानक ही उसके सामने एक विशाल समस्या आ खड़ी हुई है. 2008 के दौर में कुछ कंपनियों को आर्थिक मदद देकर संभाला गया. लेकिन, आज अगर सरकार ऋण दे तो उसे सभी को देना पड़ेगा. हर सेक्टर में उत्पादन और ख़रीदारी प्रभावित हुई है.
कोरोना वायरस का असर पूरे दुनिया पर पड़ा है. चीन और अमरीका जैसे बड़े देश और मज़बूत अर्थव्यवस्थाएं इसके सामने लाचार हो गए हैं. इससे भारत में विदेशी निवेश के ज़रिए अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की कोशिशों को भी धक्का पहुंचेगा. विदेशी कंपनियों के पास भी पैसा नहीं होगा तो वो निवेश में रूचि नहीं दिखाएंगी.
हालांकि, जानकारों का कहना है कि अर्थव्यवस्था पर इन स्थितियों का कितना गहरा असर पड़ेगा ये दो बातों पर निर्भर करेगा. एक तो ये कि आने वाले वक़्त में कोरोना वायरस की समस्या भारत में कितनी गंभीर होती है और दूसरा कि कब तक इस पर काबू पाया जाता है.