PSD-2.O सख्ती और संयम का नजारा पेश कर रहे। वह हड़बड़ी से बच के अहम फैसले ले रहे। जल्दबाज़ी शब्द को शब्दकोश से ही निकाल बाहर किया लग रहा। हर डग बेहद सोच-समझ के भर रहे। अहम पहलू उनके राज का आज ये है कि बेलगाम नौकरशाही को न सिर्फ काबू में कर लिया है बल्कि उनको भारी दबाव-तनाव के शिकंजे में फांस लिया है। वे गहरी सोच में घिरे हुए हैं कि न जाने उनके साथ मट्ठा मथाई में क्या होगा? उनके हिस्से अमृत आएगा या विष!
उत्तराखंड बनने के बाद सदा ही सरकार पर हावी रहे IAS-IPS-IFtS अफसर पहली बार इस कदर बैक फुट पर दिख रहे। पुष्कर हड़बड़ी धैर्य को हथियार बनाए हुए हैं। उन्होंने मंत्रालय बांटने में जल्दबाजी नहीं की। अब नौकरशाही में रत्न-पत्थरों को अलग-अलग करने में भी खूब गृह कार्य कर रहे। उनके संयम के साथ ही सख्ती वाला रुख उस परिपक्वता के साथ सामने आया है, जो एक मुख्यमंत्री के लिए जरूरी गुण होता है।
पुष्कर को पहली बार CM बनाया था तो सबसे बड़ी कमी उनकी अनुभवहीनता को माना गया था। वह उत्तराखंड के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री थे जो मंत्री का अनुभव लिए बगैर इस कुर्सी पर बिठाए गए थे। साल 2000 में अन्तरिम BJP सरकार में CM बने नित्यानन्द स्वामी भले कभी मंत्री नहीं रहे थे लेकिन तब वह UP विधान परिषद के सभापति थे। बहुत अनुभवी और बड़े कद के थे।
उनके बाद काँग्रेस-बीजेपी दौर में बारी-बारी से ND तिवारी-BC Khanduri-डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक-विजय बहुगुणा-हरीश रावत-त्रिवेन्द्र सिंह रावत-तीरथ सिंह रावत CM बने। सिर्फ बहुगुणा को मंत्री रहने का अनुभव नहीं था, लेकिन वह काँग्रेस सरकार के मुखिया बनाए गए थे। बाकी सभी नाम केंद्र या फिर UP-उत्तराखंड में मंत्री रह चुके थे। पुष्कर 9 महीने पहले बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण हालात में मुख्यमंत्री बनाए गए थे। उनको तब उत्तराखंड में पार्टी की ध्वस्त हो चुकी दशा को सुधार के विधानसभा चुनाव फतह करना था।