ऐसा माना जा रहा है कि उत्तराखंड में इस बार त्रिशंकु विधानसभा भी मुमकिन है। ऐसा भी हो सकता है कि BSP और निर्दलीय भी ठीक-ठाक जीत सकते हैं। बात अगर एक पार्टी की सरकार की गारंटी देने की हो तो इस बार के चुनाव ऐसे हुए हैं कि कोई भी दावा करने का दुस्साहस गंभीरता के साथ नहीं कर पर रहा। सरकार बनाने के ख्वाब में जी रहे दोनों प्रमुख दल हर किस्म की चुनाव नतीजों को ले के Extra Alert दिख रहे। वे अभी से एक-दूसरे के कमजोर जड़ समझे जाने वाले संभावित विजेताओं पर भी पैनी नजर जमाए हुए हैं। BSP और निर्दलियों के हिस्से आने वाली सीटों पर भी गिद्ध दृष्टि अभी से जमाए हुए हैं। गोया उन पर उन्हीं का हक तय है।
साल 2007 में BJP सबसे बड़ी पार्टी तो बन गई थी, लेकिन अकेले दम बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी। तब होटल Great Value (आजकल शहँशाह होटल) में निर्दलीय जीत के आए राजेंद्र भण्डारी और यशपाल बेनाम पर आधी रात के बाद तक उसी तरह अधिकार जमाने की लड़ाई बीजेपी-काँग्रेस की टीमों में हुई थी, जैसा कि रानी पद्मावती को ले के उनके पति चित्तौड़गढ़ के राजा रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी की फौज में किसी जमाने में हुई थी।
भारी पुलिस बल अपने आला अफसरों की अगुवाई में होटल में होने के बावजूद दोनों निर्दलीय विधायकों की दशा खुले आम अपहरण होने जैसी हो गई थी। इन दोनों पर आखिरकार बीजेपी ने अपना मंत्र फूंका और सरकार बनाई। कुछ महीनों बाद नेता विधायक दल हरक सिंह रावत से नाराज धुमाकोट (तब के) विधायक लेफ्टिनेंट जनरल (रि) तेजपाल सिंह रावत भी काँग्रेस छोड़ BJP में शामिल हो गए थे। वह बाद में पौड़ी के MP बनने में सफल रहे। उनकी सीट पर ही CM भुवंचन्द्र खंडूड़ी लड़े और जीते थे।
खास बात ये थी कि BCK के लिए कोई भी विधायक कुर्सी छोड़ने के लिए राजी नहीं थे। TPS ने कुर्सी और पार्टी छोड़ी तो बीजेपी के हिस्से एक और Extra Seat आई थी। साल 2012 में भी 1 सीट से BJP पिछली लेकिन बहुमत से दूर रह गई थी। उसको भी बसपा-निर्दलियों का समर्थन लेना पड़ा था। तब मोदी-शाह का नियंत्रण पार्टी में होता तो वह सरकार बनाने के बारे में काँग्रेस ख्वाब में भी शायद ही सोच पाती। BJP को 31 और Congress को 32 सीटें मिली थीं।
साल-2017 में BJP की सुनामी में BSP-निर्दलीय तो दूर काँग्रेस के भी परखच्चे उड़ गए थे। इस बार कहने को BJP-Congress साफ बहुमत हासिल करने का दावा कर रहे, लेकिन वे इस आशंका से भी घिरे हुए हैं कि अगर वे सिर्फ बिना बहुमत वाली सबसे बड़ी पार्टी बन के रह गए या फिर बहुमत तलवार की धार पर हुआ तो क्या होगा। इस खतरे को दोनों भाँप चुके हैं। चुनाव में BSP-निर्दलियों की एक बार फिर बहार आने की संभावना देख वे अपने सारे कार्ड खेल सकते हैं। इसमें वे कतई नहीं चूकेंगे, ये तय है। काँग्रेस आधिकारिक तौर पर 47 और BJP 60 सीटें जीतने का दावा कर रही है। हकीकत और Ground Realities से दोनों अच्छी तरह वाकिफ हैं।
BJP के लिए जीत गए BSP विधायकों को साथ में लेना बाएँ हाथ का खेल साबित हो सकता है। मायावती सालों से BJP और मोदी-शाह के ईशारे से कहो या हुक्म से अपने आँगन में खामोशी से बैठी हैं। बजाए बीजेपी के खिलाफ सपा के अखिलेश यादव की तरह ईंट से ईंट बजाने के। वह अपने घर की दहलीज पार करने से इस बार UP में भी बुरी तरह हिचकी दिखी। उसको समर्थन देना ही होगा तो पहली पसंद कमल का फूल ही होगा। निर्दलियों को अपने पाले में करना किसी भी दल के लिए कभी भी टेढ़ी खीर नहीं रहा।