राजधानी की किसी भी सीट को ले के इतनी उथल-पुथल BJP या Congress में देखने को नहीं मिल रही, जितनी इस सीट पर अजेय रहे हरबंस कपूर के अचानक निधन के बाद कैंट सीट को ले के दिखाई दे रही। आलम ये है कि BJP के सबसे अधिक और दमदार दावेदार इसी सीट पर टिकट के लिए जान लगाए हुए हैं। फतह की गंध का एहसास होने या उम्मीदें जागने के चलते काँग्रेस के भीतर भी इस सीट के टिकट के लिए ज़ोर आजमाइश बढ़ गई है।
कपूर के रहते BJP के भीतर टिकट के लिए लोग कोशिश तो करते दिखते थे, लेकिन इतनी उम्मीदें और ताकत टिकट के लिए लगाते कभी नहीं दिखे। उनको कभी नहीं लगा कि वे कपूर का टिकट काटने की हैसियत रखते हैं। UP के विभाजन और उत्तराखंड के गठन से पहले ही बहुत मजबूत नाम हो चुके कपूर का राजनीतिक चमकदार इतिहास किसी भी दल के किसी भी शख्स पर कहीं भारी पड़ता था। 1985 में काँग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट ने जब उनको हराया था तब देहरादून सीट हुआ करती थी। बाद में इसके तमाम टुकड़े हुए। 1989 में एक बार उन्होंने विजय पाई तो फिर वह कैंट सीट के अजेय सम्राट बन उठे।
नाव से कुछ हफ्ते पहले उनकी अचानक सोते ही मृत्यु हो जाने के बाद अब BJP के साथ ही Congress में इस सीट के टिकट के लिए जबर्दस्त रस्साकशी दिख रही। BJP में विश्वास डावर-विनय गोयल-पुनीत मित्तल-जोगेन्द्र पुंडीर-अनिल गोयल के साथ ही कपूर की पत्नी सविता और पुत्र अमित का नाम टिकट के दावेदारों में प्रमुखता के साथ लिया जा रहा। अगर मेहनत और संघर्ष की बात की जाए तो जोगेन्द्र ने खुद को आम लोगों और जन सरोकारों से पार्टी के इतर जोड़े रखा है।