देहरादून: नरेंद्र सकलानी व मोलू भरदारी टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड का एक गौरववित्त नाम रहा है! जिन्होंने देश की आजादी के 5 महीने बाद जनता के शासन की मांग करना और इस मांग के लिए शहीद होना चुना ! जो कि क्रांतिकारी आंदोलनों के इतिहास में दर्ज है!
11 जनवरी 1948 को कीर्ति नगर में कामरेड नागेंद्र सकलानी और कामरेड मोलू बरदारी की शहादत टिहरी में राजशाही के खात्मे के परवाने पर निर्णायक सिद्ध हुई!
यह वही राजशाही थी जो 30 मई 1930 को तिलाडी में सैकड़ों किसानों का खून बहा चुकी थी ! यही राजशाही श्री देव सुमन के उत्तरदाई शासन की मांग पर गौर करने के बजाय उन्हें मौत के मुंह में धकेलने का विकल्प चुना जेल में 84 दिन की भूख हड़ताल के दौरान सुमन इतनी ही मांग कर रहे थे ! कि टिहरी में उत्तरदाई शासन स्थापित महाराजा करें !राजशाही ने इतना ही किया कि भूख हड़ताल के बाद सुमन के शरीर को बंद करके भीलगाना नदी में बहा दिया !जिससे श्री देव सुमन की शहादत के बाद राजशाही के खिलाफ लड़ाई थोड़ा कमजोर पड़ गई थी ! लड़ाई की अगुवाई करने वाला प्रजामंडल पस्त और बिखर चुका था! तभी नागेंद्र सकलानी इस क्रूरता को बर्दाश्त न करने राजशाही के चुंगल से टिहरी की जनता को मुक्त कराने का प्राणपण से लगे !! और शहादत तक लड़ने का ठान लिया! राजशाही इतनी क्रूर थी ! जिसके कत्लेआम का अंदाजा कामरेड बृजेश कुमार द्वारा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य पत्र मुक्तिसंघर्ष में नागेंद्र सकलानी पर लिखे संस्मरण से होता !
जिस वीर की शहादत पर “डॉक्टर सुनील कैंथोला” द्वारा रचित एवम टिहरी रंगमंच के कलाकारों ने मिलकर मुख जात्रा नाम से एक नाटक देहरादून राजधानी में तैयार किया जा रहा है! जो टाउनहोल देहरादून में जल्द ही उत्तराखंड निवारियो के सामने जल्द प्रस्तुत किया जायेगा! जो क्रांतिकारी नरेंद्र सकलानी कामरेड मोलू बरदारी को समर्पित है !व उत्तराखंड के क्रांतिकारी आंदोलनों में गौरवशाली रहे नरेंद्र सकलानी जी मोलू बरदारी की जीवन पर आधारित है !:!
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