महाराष्ट्र में बीजेपी ने रातों-रात उलटफेर करते हुए देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बना दिया था. वहीं, अजित पवार डिप्टी सीएम बन गए. कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के लिए यह बड़ा झटका था, क्योंकि तीनों दल गठबंधन की कवायद में लगे थे और उद्धव ठाकरे के रूप में सीएम पद के उम्मीदवार पर सहमति भी बन गई थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. इस बीच बीजेपी लगातार बहुमत साबित करने का दावा करती रही. अजित पवार भी बीजेपी का साथ देने की बात कर रहे थे ट्विटर वॉर शुरू कर दिया था. उधर, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए फैसला मंगलवार की सुबह 10:30 बजे तक के लिए सुरक्षित रख लिया. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बुधवार यानी शाम 5 बजे तक सदन में देवेंद्र फडणवीस बहुमत साबित करें. साथ ही यह भी निर्देश दिया कि बहुमत साबित करने के लिए गुप्त मतदान नहीं होगा और इसका लाइव प्रसारण किया जाएगा. कोर्ट के फैसले के बाद सदन में बहुमत साबित करने की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन बहुमत साबित करने की नौबत ही नहीं आई.
पहले अजित पवार ने अपने पद से इस्तीफा दिया, फिर देवेंद्र फडणवीस ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस्तीफे का ऐलान करके सबको चौंका दिया. महाराष्ट्र में हुए इस सियासी घटनाक्रम को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं. सवाल है कि जो बीजेपी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक बहुमत साबित करने की बात कर रही थी और पार्टी की तरफ से तमाम दावे किये जा रहे थे, उसके सीएम ने कोर्ट के फैसले के ठीक बाद इस्तीफा क्यों दे दिया? बीजेपी और अजित पवार के तमाम दावे के बावजूद कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की तिकड़ी ने अपने विधायकों को एकजुट कैसे रखा? शिवसेना की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने NDTV के लिए लिखे अपने ब्लॉग में इन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की है. बकौल प्रियंका चतुर्वेदी, तीनों दलों ने इस स्थिति से निपटने के लिए पूरे दमखम के साथ लड़ने का निर्णय लिया. इस लड़ाई में तीनों दलों की अलग-अलग भूमिका तय की गई.
शिवसेना को मिला था विधायकों को सुरक्षित रखने का जिम्मा
महाराष्ट्र के सियासी संग्राम में एनसीपी की भूमिका सबसे अहम थी, क्योंकि अजित पवार डिप्टी सीएम बन गए थे और अपने साथ अन्य विधायकों के होने का दावा कर रहे थे. ऐसे में एनसीपी को जिम्मेदारी दी गई कि वह अपने विधायकों को एकजुट रखे. इस काम में पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता लगे थे. दूसरी तरफ, विधायकों को तोड़फोड़ से कैसे बचाया जाए, इसकी जिम्मेदारी शिवसेना को दी गई. शिवसेना ने यह सुनिश्चित किया कि तीनों दलों के विधायक एक साथ और सुरक्षित रहें. एनसीपी और शिवसेना के अलावा कांग्रेस को लीगल फ्रंट पर लड़ने की जिम्मेदारी दी गई, क्योंकि पार्टी के तमाम नेता इस काम में अनुभवी और पेशेवर हैं. कांग्रेस ने पूरे मामले को पूरे दमखम के साथ सुप्रीम कोर्ट में रखा.