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CM अकेले पहाड़ तोड़ रहे!मौज में मंत्री-नौकरशाह,,,,

ये स्थापित सत्य-तथ्य है कि उत्तराखंड में कोई भी बड़ा संकट और आपदा घर करती है तो मंत्री-नौकरशाह-सांसद-स्थानीय विधायक बेपरवाह-मौजमस्ती के अंदाज में ही दिखते रहे हैं.उनको राहत या मदद के कार्यों में भी उसी वक्त देखा जाता है जब मुख्यमंत्री या फिर केंद्र से कोई बड़ा चेहरा मौके पर आ पहुँचता है.मंत्रियों और नौकरशाहों में तालमेल की कमी रहती है या फिर नौकरशाही में भी मैं सीनियर-तू जूनियर या फिर मेरी ज्यादा चलती है वाला भाव अधिक दिखने लगा है.नुक्सान देवभूमि और यहाँ के लोगों का हो रहा.हालात ये है कि मंत्रियों-MPs-MLAs की भूमिका जिम्मेदारियों को निभाने के मामले में नगण्य सी दिखती है.ये उम्मीद ज्यादती है कि हर मसले को CM संभाले या वही हर जगह मौजूद दिखाई दें.IAS-IPS-IFtS ही नहीं PCS-PPS अफसर और कहीं-कहीं कोतवाल दर्जे वाले भी मैं ही System हूँ-मैं ही तंत्र हूँ, होने लगे हैं.

भीषण गर्मी का प्रकोप देश भर में छाया है.उत्तराखंड में जंगल लगातार धधक रहे.जंगल महकमे के ही 4 लोग ज़िंदा जल गए.गाड़ियाँ 4 धाम यात्रा मार्गों पर खाइयों में गिर रहीं.उसमें भी कई जिंदगियां ख़त्म हो रही.किसी भी मुख्यमंत्री के लिए ये मुमकिन नहीं है कि तमाम तंत्र उपलब्ध होने के बावजूद वह हालात को अकेले दम संभाले.ऐसा होता तो फिर न मंत्रिपरिषद-मंत्रिमंडल की दरकार होती न शासन में बड़े-बड़े नौकरशाहों को करोड़ों रूपये के खर्चे पर रखना पड़ता.जंगल की आग और उसमें पैदा हो रही दिक्कतें अधिकांश कुदरती है लेकिन सरकार की भूमिका बचाव और राहत में निश्चित तौर पर रहती है.इसमें DFO-DM-Conservator और महकमे के HoD-सचिव-मंत्री सीधे तौर पर जिम्मेदार रहते हैं.

उन्होंने या तो गर्मियों के सीजन से पहले तैयारी नहीं की या फिर जंगल की आग शुरू होने के फ़ौरन बाद उसकी गंभीरता-आशंकाओं का सही अध्ययन नहीं किया.सीधे कहें तो घनघोर लापरवाही बरती.गाड़ियाँ ऊंचाइयों से नीचे खाई या नदियों में गिर के लोगों की जिंदगी ख़त्म कर रहीं.इसमें पुलिस-जिला प्रशासन-परिवहन विभाग की सीधी जिम्मेदारी रहती है.आखिर तय संख्या से ज्यादा सवारियां कैसे ढोई जा रही!चालकों की History भी गाड़ी के Log Book में होनी चाहिए कि वह कब से बिना आराम किए स्टेयरिंग थामे हुए है.नींद और थकान बड़े हादसे की बड़ी वजह होते हैं.पहाड़ों में ये बहुत घातक और जानलेवा हो सकता है.या फिर हो रहा है.दिक्कत ये है कि महकमे के HoDs पर उनके ऊपर शासन में बैठे सचिव-प्रमुख सचिव-ACS तक नियंत्रण पूरी तरह काबू नहीं पा सक रहे.दोनों में समन्वय बहुत कम है या फिर गायब दिखता है.सभी कहीं न कहीं ऐसा जुगाड़ फिट किए हुए हैं, जो उनको किसी भी मौज-मस्ती और बेपरवाह अंदाज में जीने के पलों में बाधा डालने किसी भी सूरत में नहीं देता है.

मंत्रियों का हाल ये है कि उनको सिर्फ खुद से वास्ता है.वे जनसम्मेलनों-अभिनन्दन समारोहों में ही व्यस्त अधिक दिखते हैं.बहुत हुआ तो परदेस के दौरे पर भी जा सकते हैं.विधायक और सांसदों की भूमिका के बारे में तो खुद वे ही चर्चा करने से बाज आते हैं.लोकसभा चुनाव ख़त्म होते ही सभी BJP प्रत्याशी अपने चुनाव क्षेत्र से गायब हो चले थे.फिर उनका चेहरा तभी दिखाई दिया जब चुनाव नतीजे आए और वे विजयी हुए.4 धाम यात्रा में पर्यटकों-तीर्थयात्रियों-स्थानीय लोगों को तमाम दिक्कतों के बावजूद वे अपनी MP वाली भूमिका को भुला बैठे हैं.विधायकों पर तो उनके क्षेत्र के लोग ही जिताने के बाद से कोई आस करना छोड़ चुके हैं.भले वे BJP के हों या फिर Congress के.

ऐसा आभास होने लगा है या फिर साफ़ दिखाई देते है कि मंत्रियों-नौकरशाहों ने काम न करने की कसम खाई हुई है.MPs-MLAs से कोई उम्मीद रखना फिजूल है.विभागीय अफसरों का भी हाल ये है कि वे अपने मंत्री और HoD की भी परवाह नहीं करते हैं.इन दिनों ऐसा ही एक मामला मेरी निजी जानकारी में है.एक प्रतिष्ठित 5वीं तक के स्कूल को जिला स्तर के अधिकारी इस कदर परेशान किए हुए हैं कि उसके प्रबंधन के लोग DG-मंत्री तक गुहार करने पहुंचे कि वे गलत कुछ नहीं कर रहे.दोनों ने साफ़-साफ़ आश्वासन दिया कि ना-इंसाफी नहीं होगी.हैरानगी की बात है कि जिस दिन वादा किया गया उसी दिन स्कूल की मान्यता ख़त्म कर दी गई.अपने मंत्री-DG की राय जानते हुए भी.अफसर BJP के ही विधायक का भाई है.मतलब ये है कि मंत्री-शासन में बैठे अफसर सिर्फ नमूने हो के रह जाते हैं.अगर कोई महकमे का अफसर भी ज़रा सी सियासी पकड़ रखता है.एक स्कूल को नाम और प्रतिष्ठा बनाने में बहुत मेहनत लगती है.तानाशाह किस्म का एक अफसर उसको चुटकी बजाते मिट्टी में मिला डालता है.सरकार कुछ नहीं कर पा रही.

एक और मिसाल है.एक बड़े नौकरशाह ने नियमानुसार कार्यवाही के लिए कुमायूं के एक किसी कारोबारी के प्रत्यावेदन पर एक निगम के MD को निर्देश दिए.MD ने शासन में बैठे अपने ही Boss की वरिष्ठता पर सवाल उठाते हुए प्रत्यावेदन ले के पहुंचे बन्दे की सिट्टी-पिट्टी गुम करते हुए खूब गरिया डाला.ये मामला ऐसे नौकरशाह से वास्ता रखता है, जो खुद में दबंग है और आने वाले दिनों में उनका CS बनना तय है.तब ये हाल है.बेचारा फरियादी बंदा परेशान घूम रहा.इस किस्म के अफसरों से ही सरकार की छवि को नुक्सान होता है.मुख्यमंत्री पर नाहक जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ता है.अगर हाल के महीनों में या फिर उनके पहले और दूसरी पारी को देखें तो साफ़ होता है कि पुष्कर ने सरकार और BJP की नौका को PM नरेंद्र मोदी और HM अमित शाह के साए में खुद ही किनारे लगाई.मंत्रियों ने तो नौका में तमाम छेद कर उसको डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

बेशक ये पुष्कर के संग ज्यादती है कि उनको आज भी उन्हीं मंत्रियों के साथ टीम बना के काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.कई मंत्रियों की छवि समाज और कारोबारियों के बीच कैसी है, किसी से छिपी नहीं है.उम्मीद की जा रही है कि देश भर में विपरीत हालात के बावजूद उत्तराखंड में BJP को 100 फीसदी Strike Rate के साथ विजय दिलाने के बाद अब उनको मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार के लिए मौक़ा मोदी-शाह-आलाकमान-संघ से मिल जाएगा.पुष्कर ने साल-2022 में इतिहास रचते हुए BJP को श्मशान घाट से ला के फिर दौड़ना सिखाया.फिर लोकसभा चुनाव में सभी 5 सीटें निकाल दिखाई.ये कितना मुश्किल और खतरनाक कार्य था, इसको इतने से समझा जा सकता है कि साल-2009 में BJP पाँचों लोकसभा सीट हार गई थी तो आला कमान ने उस वक्त के CM भुवनचन्द्र खंडूड़ी की कुर्सी छीन ली थी.

साल-2019 सरीखा माहौल BJP का इस बार नहीं था.फिर भी उत्तराखंड से पुष्कर ने मोदी-शाह को सभी सीटों पर जीत का तोहफा तब दिया जब एक-एक सीट की अहमियत कोहिनूर हीरे से कम नहीं.पुष्कर ने अपनी दूसरी CM पारी और दमदार ढंग से खेली है.उनके बनाए कानूनों की देश भर में चर्चा है.मोदी सरकार भी UCC-नक़ल कानून को अंगीकृत कर रही.उत्तराखंड को केंद्र में ऐसी तवज्जो मिलना ख्वाब जैसा है.लोकसभा चुनाव में PSD को सितारा प्रचारक की भूमिका आला कमान ने दी थी.उन्होंने एक दिन में 8 कार्यक्रम तक किए.इनमें बतौर मुख्यमंत्री देहरादून में सरकार के कामकाज निबटाना और फिर उसी दिन पंजाब-चंडीगढ़-हरियाणा-दिल्ली में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करना शामिल रहा.इसके लिए ऊर्जा और जिजीविषा चाहिए होती है.उनके मंत्रिमंडल के सदस्य सीमित जिम्मेदारियों के बावजूद सिर्फ कार्यक्रमों तक खुद को बांधे हुए हैं.उसको ही वे अपना फर्ज और कार्य समझ रहे हैं.यही वजह है कि जंगल में आग लगी हो या फिर उसमें लोग जिन्दा भस्म हो रहे हों या फिर गाड़ियाँ गिर रही हों,सभी जगह तत्काल मुख्यमंत्री को मौके पर देखा जा रहा है.

लोगों के बीच रह उनकी दिक्कतों और समस्याओं को समझ के सरकार तक पहुँचाना और उनको दूर करने की जिम्मेदारियों को MPs-MLAs समझ ही नहीं रहे.उनकी सारी लड़ाई-कोशिशें सिर्फ मंत्रिपरिषद-मंत्रिमंडल में जगह पाने तक सिमट के रह गई है.या फिर खनन-जमीन के अवैध धंधों में उनकी दिलचस्पी दिखती-सुनाई देती है.जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारियों का अहसास उनको शायद है ही नहीं.लोकसभा चुनावों के बाद पुष्कर की हैसियत और प्रतिष्ठा में बहुत इजाफा हुआ है.इसका इस्तेमाल अब पुष्कर राजकाज-कामकाज में बेहतर ढंग से कर सकते हैं.उनको चाबुक फटकारना ही होगा.सवाल देश-विदेश में उनकी साख और प्रदेश की प्रतिष्ठा-लोगों की जिंदगी से जुड़ी हुई है.इसके लिए आला कमान से बात कर मंत्रियों को चलता करना पड़े या फिर नौकरशाहों की ACR में कठोर लिखना पड़े.नौकरशाह सिर्फ ACR की परवाह करते हैं.उनका कैरियर इसी पर टिका होता है.