किसान संगठनों के बीच कुछ मुद्दों पर आपसी असहमति होने के आधार पर यह कहा जाने लगा था कि अब किसान आंदोलन खत्म होने की तरफ आगे बढ़ रहा है। कहा गया कि केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों की वापसी के बाद किसान अब वापस अपने घर जाने की योजना बना रहे हैं और एक दिसंबर या चार दिसंबर को होने वाली संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में इस पर अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। लेकिन किसान संगठनों के जिम्मेदार नेताओं का रुख बता रहा है कि यह आंदोलन फिलहाल खत्म नहीं होने जा रहा है। किसान आंदोलन के अब तक चले आ रहे स्वरूप में कुछ परिवर्तन हो सकता है, किसानों की सरकार को दबाव में लाने की रणनीति में कुछ बदलाव हो सकता है, लेकिन किसान आंदोलन समाप्त होने से अभी भी कोसों दूर है।
दरअसल, किसान आंदोलन अपने प्रारंभ से ही अनेक अंतर्विरोधों का शिकार रहा है। आंदोलन को आगे बढ़ाने के तरीके, प्रदर्शन करने और केंद्र सरकार से बातचीत करने के मामले से लेकर आंदोलन का श्रेय लेने तक में कई बार किसान नेताओं का अंतर्विरोध सामने आता रहा है। लेकिन इन अंतर्विरोधों से आगे बढ़ते हुए किसान आंदोलन अभी भी जारी है। किसान नेता इसे अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत मानते हैं।
किसान नेताओं का कहना है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के हर हिस्से से किसान इस आंदोलन से जुड़े हैं। सबकी अपनी कार्यशैली और प्राथमिकताएं हैं। इसके आधार पर नेताओं की राय भी अलग-अलग होती है। लेकिन किसान नेताओं को इस बात के लिए श्रेय दिया जा सकता है कि तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी संयुक्त किसान मोर्चा के सभी नेताओं ने इसे माना और एकमत होकर आंदोलन आगे बढ़ाया। अंतर्विरोधों से निपटते हुए आगे बढ़ने की इसी ताकत का परिणाम हुआ कि पहली बार केंद्र सरकार को अपना कानून वापस लेना पड़ा।