अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर स्थित देवप्रयाग में लगभग 12 करोड़ की लागत से बनी सीवरेज योजना का कोई फायदा नहीं हुआ। करोड़ों खर्च किए जाने के बावजूद गंदगी गंगा नदी में डाली जा रही है। 2016 में प्रदेश का पहला एसटीपी (सीवर ट्रीटमेंट प्लांट) बनाया गया था।
नगर के सबसे अधिक आबादी वाले मेन मार्केट, तहसील, मंदिर मोहल्ला व संगम मार्केट को महज 150 केएलडी के एसटीपी से जोड़ा गया है। वहीं भागीरथी नदी किनारे स्थित एसटीपी की क्षमता कम होने से सीवर का पानी ओवरफ्लो होकर नदी में गिर रहा।
गंगा नदी में तीर्थनगरी देवप्रयाग का गंदा पानी न गिरे, इसके लिए वर्ष 2005-06 में लगभग साढ़े 10 करोड़ की लागत से सीवरेज योजना की स्वीकृति मिली थी। योजना के तहत 2016 में बाह बाजार में निर्माण एवं अनुरक्षण इकाई (गंगा) ने रामकुंड के समीप 1.4 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता का सॉयल बायो टेक्नोलॉजी (ग्रीन टेक्नोलॉजी) आधारित प्रदेश का पहला एसटीपी (सीवर ट्रीटमेंट प्लांट) बनाया।
इस एसटीपी में गंगा, भागीरथी व अलकनंदा नदी के अलग-अलग तटों में बसे बस्तियों का सीवर शोधित होना था, लेकिन इससे पूर्व वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में बदरीनाथ-केदारनाथ धर्मशाला के नीचे लगभग 20 मीटर सीवर पाइप लाइन क्षतिग्रस्त हो गई, जिसके चलते यहां भागीरथी नदी से सटकर 150 और 75 केएलडी (किलोलीटर प्रतिदिन) क्षमता के दो एसटीपी बनाकर नगर की सीवरेज लाइन जोड़ने का काम शुरू हुआ। इससे योजना की लागत बढ़कर लगभग 12 करोड़ रुपये हो गई।