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झारखंड में BJP की हार

पटना: झारखंड में बीजेपी की सरकार चली गई और इस परिणाम से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी खुश हो सकते हैं और इसमें ख़ुश होने के कई कारण हैं. सबसे पहले नीतीश कुमार को अब इस बात का विश्वास हैं कि बीजेपी अपने सहयोगियों से ढंग से बर्ताव करेगी. नीतीश लोकसभा चुनाव के बाद उस घटनाक्रम को अभी तक नहीं भूले हैं जिसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में अनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैसे ठुकराया दिया था. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की उनकी मांग को ख़ारिज कर दिया. अब नीतीश चाहेंगे कि विधानसभा चुनाव से पहले मोदी और शाह उनकी इन मांगों को मानें. झारखंड में बीजेपी की हार के कई कारण हैं. जिसमें आदिवासी वोटरों की नाराज़गी सबसे बड़ी वजह है. एक गैर आदिवासी मुख्यमंत्री को सत्ता की कमान देना एक भूल थी. लेकिन जब पांच साल पूर्व रघुबर दास को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बैठाया गया तब उस समय विपक्ष में रहने के बावजूद नीतीश कुमार ने इसे ग़लत बताया था और कहा था कि ये फ़ैसला झारखंड राज्य के गठन के भावना के विपरीत इसलिए है कि वो राज्य आदिवासियों के लिए बना और आप सत्ता की कमान गैर आदिवासी को दे रहे हैं, और इस परिणाम से नीतीश कुमार की बात सच साबित हुई. हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में पिछली बार बीजेपी ने नीतीश कुमार को इस बयान को लेकर घेरने की बहुत कोशिश की लेकिन बिहार में इसका कोई ख़ास असर नहीं हुआ.

हालांकि नीतीश अब यह भी कह सकते हैं कि ‘शराबबंदी योजना’ पर झारखंड ने अमल किया होता तो परिणाम उनके पक्ष में जा सकता था. लेकिन ये भी सच हैं कि रघुबर दास ने बिहार में शराबबंदी का मज़ाक़ उड़ाया था और शराब से राजस्व बढ़ाने के चक्कर में और अधिक दुकानें खुलवाईं. जिससे लोगों में नाराज़गी देखी गयी. लेकिन इससे कहीं ज़्यादा नीतीश इस बात को लेकक ख़ुश हैं कि इस परिणाम से एक बार फिर साबित हो गया कि प्रचार और प्रसार से आप चुनाव नहीं जीत सकते. ये बात किसी से छिपी नहीं है कि प्रचार और प्रसार पर रघुबर दास सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया. क्षेत्रीय चैनल हों या राष्ट्रीय चैनल रघुबर दास सब जगह छाए रहे थे जिसके कारण नीतीश कुमार को क्षेत्रीय चैनलों पर बहुत कम टाइम मिलता था और बीजेपी के उनके सहयोगी भी उन्हें इस मॉडल का अनुसरण करने की सलाह भी देते थे लेकिन नीतीश का हमेशा तर्क होता था कि आप काम से चुनाव जीत सकते हैं ना कि झूठे विज्ञापन से. रघुवर दास की विदाई से उनका ये तर्क और भी मज़बूत साबित हुआ है.

हालांकि झारखंड में जनता दल यूनाइटेड फिर खाता नहीं खुल पाया इस बात का उन्हें मलाल होगा लेकिन हां राजद के जीत से उन्हें दुख भी हुआ होगा लेकिन कम से कम आप अपने पार्टी के अंदर और आरसीपी सिंह जैसे नेताओं की नीतीश यह कहकर समझा सकते हैं कि बहुत सारे उम्मीदवार खड़ा करने से जीत नहीं होती और इससे संदेश भी जाता है कि पार्टी बीजेपी के इशारे पर डमी उम्मीदवारों को मैदान में खड़ा करती है. अब देखना होगा कि दिल्ली में भी झारखंड के परिणाम से सबक़ लेकर जनता दल यूनाइटेड (JDU)चुनाव मैदान से खुद को अलग करती है या BJP के निर्देशन में बिहार के वोटर के वोट काटने के लिए ऐसे ही उम्मीदवार मैदान में खड़ा करती है.

लेकिन नीतीश कुमार के लिए सर्वाधिक ख़ुशी का कारण अपने पुराने मित्र सरयू राय की जीत है और नीतीश को मालूम है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास से ज़्यादा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के ‘मुंह पर करारा तमाचा’ है. क्योंकि जिस बैठक में सरयू का टिकट काटा गया था तो उसमें टिकट काटने के कई सारे आधार के लाए गए थे जिसमें एक यह भी था कि कि नीतीश कुमार के दोस्त हैं और उन्होंने अपनी किताब का विमोचन नीतीश कुमार से करवाया. इस परिणाम आने के बाद नीतीश कुमार को भरोसा है आने वाले दिनों में सरयू राय जो अपनी बातों के पक्के हैं तो न केवल रघुबर दास को जेल भेजने का उपाय करेंगे बल्कि अमित शाह से सम्बंधित वैसे कागजातों को सार्वजनिक करेंगे जिनके बारे में उन्होंने अपने चुनाव के दौरान दावा किया था और अगर इतने सारे कारण हो आख़िर नीतीश मुस्कुराए भी तो क्यों न?

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