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उत्तराखंड में नौकरशाह मौज में

जब मर्जी हुई, सरकारों ने फेंटे हैं नौकरशाहों की पोस्टिंग्स के पत्ते
देश में हरियाणा कैडर के IAS अफसरों अशोक खेमका और प्रदीप कासनी समेत उत्तराखंड कैडर के IFS अफसर संजीव चतुर्वेदी के साथ सरकारों का बर्ताव लगातार सुर्खियों में है,
The Corner View

अनामिका मिश्रा
लेकिन उत्तराखंड में कई नौकरशाहों के साथ ये सब जम के हुआ और होता रहा है। जो नौकरशाह सरकार की आँख के तारे हुए, उनकी तमाम खामियों को भी दरकिनार किया जाता रहा। जो खास और विश्वासपात्र हुए या हैं, उनके सौ संगीन गुनाह भी मुआफ!
उत्तराखंड में नौकरशाहों का स्वर्णिम युग सच कहा जाए तो तब था, जब एनडी तिवाड़ी सरकार थी। तिवाड़ी नौकरशाहों को बहुत नियंत्रण में रखते थे, लेकिन किसी को बेकार और बिना काम के नहीं रहने देते थे। जो उनको पसंद न भी हो या फिर आरोपों से घिरे रहे हों, उनको भी वह काम में लगाए रखना पसंद करते थे। नौकरशाहों का सबसे खराब हाल बीसी खंडूड़ी काल में रहा। उत्तराखंड का गठन जब हुआ या फिर जब उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए नब्बे के दशक के मध्य में आंदोलन चरम पर था, सभी को ये गलत फहमी थी कि पहाड़ी राज्य में नौकरशाह सीधे और शरीफ तथा भ्रष्टाचार मुक्त किस्म के होंगे।
ये सोचा जाता था कि सरकार भी अपनों की होगी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। तिवाड़ीराज में नौकरशाहों ने जम कर मोटा माल काटा तो बाकियों के राज में कई नौकरशाह अर्श पर तो कई फर्श पर रहे। सरकारों और मुख्यमंत्री ने उनको सिर्फ पत्तों की तरह फेंटा। जब किसी नौकरशाह ने उनके नवरत्नों में सेंध लगाई या फिर सीधे पकड़ बनाई, उसकी बन आई। तबादलों की सिफ़ारिश करने वाले सिविल सर्विस बोर्ड के अध्यक्ष मुख्य सचिव हैं। उसकी संस्तुति पर ही मुख्यमंत्री तबादले करते हैं। बोर्ड महज मज़ाक बन के रह चुका है। कौन भूल सकता है कि खुद मुख्य सचिव सुरजीत किशोर दास के साथ खंडूड़ी राज में क्या हुआ था।

भूतो न भविष्यति:राकेश शर्मा
दास के दौर में मुख्यमंत्री के सचिव प्रभात कुमार सारंगी की धुन पर पूरी नौकरशाही संग मंत्री तक नाचा करते थे। जो सारंगी ने कह दिया वह फ़ाइनल हुआ करता था। दास भले, शरीफ, पुरानी नौकरशाही परंपरा और पढ़ने-लिखने, दावत लेने-देने के शौकीन थे। खंडूड़ी के मानकों के लिहाज से एकदम अनफ़िट। मुख्य सचिव के तौर पर उनके पास पूरे दिन में एक फ़ाइल नहीं आया करती थी। प्रमुख सचिव या सचिव तो दूर अपर सचिव स्तर के नौकरशाह भी उस दौर में उनके पास आने से कतराया करते थे। कहीं सारंगी को पता न चल जाए।

हर सरकार के लाडले: दो बार बने मुख्य सचिव
दास ने वीआरएस ले के उत्तराखंड लोक सेवा आयोग अध्यक्ष बनना पसंद किया। चले गए। उस दौर में लंबे समय तक 1976 बैच के ही विजेंद्र पाल को भी खंडूड़ी-सारंगी जोड़ी ने बिना काम काज के रखा। पाल खासे दमदार थे। बेहद ज्ञानवान और तेज तर्रार। सरकार का नजरिया देख उन्होंने पहले ही रिटायरमेंट ले लिया। भले उनका स्वास्थ्य खराब था, लेकिन वह काम के मामले में स्वास्थ्य को कभी भी आड़े आने नहीं दिया करते थे। उसी दौरान बाद में अपनी कार्य शैली और नतीजेप्रधान कार्यों के कारण छा गए 1981 बैच के राकेश शर्मा और 1985 बैच के प्रतिनियुक्ति वाले पराग गुप्ता का भी हाल सरकार ने खराब रखा।

एम रामचंद्रन:मुख्य सचिव को पैदल करने की शुरूआत करने वाले
शर्मा जैसा मुख्य सचिव और नौकरशाह न पहले कभी आए न आने की ही उम्मीद दिखती है। उनके दौर में सचिवालय के नौकरशाह और कलेक्टरों ने नतीजे भी खूब दिए और अवाम खुश रहा। सरकार ने सबसे ज्यादा नतीजे उनके जलवे के दौरान ही दिए। शर्मा को खंडूड़ी ने बतौर सजा तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण सरीखा महकमा दिया था, जिसमें पूरे दिन में एक फ़ाइल नहीं आती थी। बजट भी सिर्फ नॉन प्लान का था। शर्मा ने इन महकमों को बाद में मलाईदार में बहुत जल्दी तब्दील कर दिखाया था। तिवाड़ी राज में शुरू में एम रामचंद्रन को खेल और युवा कल्याण तथा तकनीकी शिक्षा महकमा दिया गया था। बाद में उन्होंने तिवाड़ी को इस तरह अपने मोहपाश में बांधा कि फिर वह सबसे विश्वासपात्र नौकरशाह ही नहीं बेहद शक्तिशाली भी बन के उभरे थे।

किस बात की सजा झेल रहे रामास्वामी:मुख्य सचिव का चार्ज शत्रुघ्न सिंह से लेने के दौरान
टोलिया ने मजबूर हो के वीआरएस लिया तो सिर्फ रामचंद्रन के कारण। मुख्य सचिव रहने के दौरान ही टोलिया की अहमियत रामचंद्रन ने, जो तब मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव थे, ने तकरीबन खत्म कर डाला था। एक ही समय में जब भी टोलिया-रामचंद्रन की बैठक होती थी तो प्रमुख सचिव-सचिव सिर्फ रामचंद्रन की बैठक में मौजूद रहते थे। टोलिया अपर सचिवों-अनु सचिवों से काम चलाते थे। नौकरशाहों के प्रति सरकार की बेरुखी की मिसाल कई नौकरशाह हैं। इनमें डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया, अजय जोशी, आलोक जैन, एस रामास्वामी, उषा शुक्ला, दमयंती दोहरे के नाम खास तौर पर शामिल हैं। रामास्वामी अभी सेवा में हैं। मुख्य सचिव की कुर्सी से उनको हटाए जाने के बाद से उनको एक किस्म से कोल्ड स्टोर में डाल दिया गया। जोशी की तो दुर्दशा ही हुई।

बेटे के साथ आलोक बिहारी लाल:सिस्टम के शिकार
उनको नाम के लिए आईडीसी बनाया गया, जिसमें न काम था न कोई ताकत। वह यूपी से उत्तराखंड सिर्फ मुख्य सचिव बनने की लालसा लिए आए थे। सुभाष कुमार से वह पार नहीं पा सके। सुभाष का रेकॉर्ड है है कि वह एक नहीं दो बार मुख्य सचिव बने। जैन के साथ भी यही हुआ। प्रभावी मुख्य सचिव और उससे पहले वित्त सचिव रहने के दौरान उनका डंका बजता था। काम में उनका कोई सानी नहीं था। एक साल में ही उनको मुख्य सचिव की कुर्सी से हटा दिया गया। वह खरा बोलने वाले और मुख्यमंत्री की हर गलत-सलत बातों में भी हाँ कहने वाले नौकरशाह नहीं थे। इसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा। हटाए जाने के बाद उनको फिर इधर-उधर बेवजह की कुर्सियाँ दी जाती रहीं। उन्होंने भी टोलिया, दास की राह पकड़ना बेहतर समझा। वीआरएस लिया और सेवा का अधिकार आयोग में मुख्य आयुक्त बन गए।

जूनियर स्तर पर भी देखा जाए तो मंजुल जोशी, भास्करानंद जोशी, उषा शुक्ला, दमयंती कलेक्टर बनने का सुख लिए बिना रिटायर हो गए। कड़क किस्म के सुरेन्द्र सिंह रावत खुशकिस्मत रहे कि कम से कम छह महीने के लिए तो उधम सिंह नगर के कलेक्टर बने। और भी कई नाम IAS कैडर में तब रहे, जो हमेशा सरकार की नजरों से दूर ही रहे या फिर उपेक्षा झेलते रहे। आज जहां कई युवा और जूनियर स्तर के नौकरशाह अहम महकमे संभाले हुए हैं, तो कई वरिष्ठों के पास काम काज या तो बहुत कम है या फिर कम अहमियत वाले हैं। ताज्जुब होता है कि आरके सुधांशु, विनोद प्रसाद रतुड़ी, हरबंस सिंह चुग, बृजेश संत, हरी सेमवाल, पंकज पांडे, चंद्रेश यादव के पास नाम मात्र के काम हैं।

खास बात ये है कि जिनके पास महकमों का बोझ है, नतीजे वे उम्मीदों के मुताबिक नहीं दे पा रहे हैं। IPS कैडर का हाल और बुरा रहा। आलोक बिहारी लाल 1975 बैच के होने के बावजूद कभी DGP नहीं बनाए गए। वह DG रिटायर हो गए। उनसे के बैच जूनियर सुभाष जोशी और ज्योति स्वरूप पांडे को तब DGP बनाया गया, जब लाल सेवा में ही थे। IAS से उलट IPS में DGP और DG के वेतनमान में फर्क है। मुख्य सचिव और अपर मुख्य सचिव समान वेतनमान वाले हैं लेकिन डीजीपी अगर जूनियर बैच का भी हो तो उसका वेतन सीनियर DG से ज्यादा होता है। लाल इसके खिलाफ हाई कोर्ट गए। फिर वहाँ से DGP वेतनमान पाने की लड़ाई जीती। तब तक उनको रिटायर हुए सालों गुजर चुके थे।

लब्बो-लुआब ये कि जो सरकार के लाडले और आँखों के तारे रहे या हैं, वे ही सरकार में छाए रहे। काबिलियत कभी भी मानक नही रहा। 20 साल के भी पूरे न हुए उत्तराखंड में ये सब कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता है। और फिर संजीव चतुर्वेदी तो उत्तराखंड में ही धक्के खा गए। बीजेपी राज में भी। आज के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के दौर में नौकरशाहों के कामकाज के बँटवारे को ले के भले अंगुली उठती रहती है लेकिन एक चीज उनकी काबिले तारीफ है। वह है नौकरशाही और खास तौर पर कलेक्टरों की कुर्सियों पर अच्छे नौकरशाहों की पोस्टिंग्स करना। उनको स्थायित्व देना। पहले के मुख्यमंत्रियों के दौरान कलेक्टर 5-6 महीने भी नहीं चल पाते थे। कुर्सियाँ बिका करती थीं। ऐसा अंदरखाने कहा जाता था। सिविल सर्विस बोर्ड और दो साल तक की तैनाती के नियम के बावजूद वे हटाए जाते रहे। बनाए जाते रहे।

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